Monday, May 29, 2017

एक कवि की पीड़ा

जब कभी कविता की पंक्तियाँ पढ़ता हूँ 
तो भाषा का अनुचित प्रयोग का ज्ञान होता है
हिंदी में कही जाने वाली पंक्तियों में 
अन्य भाषाओं के शब्दों का समावेश होता है

ना जाने कहाँ विलीन हो गई है परिपक्वता
अब तो काव्य की रचना मैं भी है अराजकता
भावनात्मक विश्लेषण भी अब नहीं है होता
कहीं विलुप्त होती कला का ही आभास है होता 

संदेश से मैं भावविभोर कैसे हो सकता हूँ 
जब अपनी ही मातृभाषा की पीड़ा देखता हूँ 
क्षोभ होता है मुझे ऐसे कवियों पर 
बनाते है पुष्पमाला काँटे पिरोकर 

बस अब एक ही विनती है जन जन से
कुछ तो प्रयत्न करो अपने हृदय से 
मशतिष्क को ना घेरो ऐसे विडम्बना से 
कि कहीं विलुप्त ना हो जाए भाषा प्रचलन से।।

Sunday, May 28, 2017

बात की बात

कहीं दिन कहीं रात की है बात
कि लफ़्ज़ों से मुलाक़ात की है बात
नहीं कोई शिकवा किसी लम्हे से हमें 
गर इस नज़्म का तकल्लुफ़ ना हो तुम्हें


कि यहीं एक बात से निकलती है एक बात
कहीं दिन तो कहीं रात में गुज़रती है बात
लफ़्ज़ों से कहीं तो कहीं अदाओं से कही बात 
कहीं निगाहों से कहीं आब-ऐ-तल्ख़ से कही बात


ज़िंदगी के हर रूख से निकली हुई बात 
कहीं हँसती हंसाती कहीं रोती से ये बात 
हर मोड़ पर उठती हुई एक नए रूख की बात 
की लफ़्ज़ों से मुलाक़ात में निकली हुई बात


नहीं इस बात मैं गर कुछ है तो मेरे जज़्बात 
नहीं इस बात में गर कुछ है तो वक़्त ओ हालात 
गर इस बात में अब भी कुछ है तो है लफ़जात 
क्योंकि इन्हीं लफ़्ज़ों से तो बनती है हर एक बात।।